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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष ! (बाहुमान्) बलवान् भुजाओंवाला तू (वज्रेण) वज्र से (अवाचीनान्) नीचों [अधार्मिकों] को (अव जहि) मार गिरा। (अध) फिर (मामकान्) अपने (सपत्नान्) वैरियों को (अग्निः) अग्नि के (तेजोभिः) तेजों से (आ अदिषि) मैंने पकड़ लिया है ॥३०॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण बली, पराक्रमी, प्रतापी राजा को स्वीकार करके शत्रुओं के मारने में सहायक होवें। सब मनुष्य इस ईश्वरनियम का पालन करें ॥३०॥
टिप्पणी: ३०−(अवाचीनान्) अधोगतीन्। अधार्मिकान् (अव जहि) विनाशय (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् सेनापते (वज्रेण) शस्त्रेण (बाहुमान्) प्रबलभुजः (अध) अथ (सपत्नान्) (मामकान्) अ० १।२९।५। मम सम्बन्धिनः (अग्नेः) पावकस्य (तेजोभिः) ज्वालाभिः (आ अदिषि) ददातेर्लुङ्। गृहीतवानस्मि ॥
