जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पृश्निमातरः) हे पूँछने योग्य वेदवाणी को माता समान मान करनेवाले, (उग्राः) प्रचण्ड (मरुतः) शूर लोगो ! (यूयम्) तुम (इन्द्रेण) बड़े ऐश्वर्यवाले सेनापति (युजा) मित्र के साथ (शत्रून्) शत्रुओं को (प्र मृणीत) मार डालो। (सुदानवः) हे बड़े दानियो ! (त्रिषप्तासः) हे तीन [कर्म, उपासना और ज्ञान] के साथ सात [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नासिका, मन और बुद्धि] को रखनेवाले (स्वादुसंमुदः) हे भोजन योग्य अन्न में मिलकर आनन्द पानेवाले ! (मरुतः) हे शूर पुरुषो ! (रोहितः) सबका उत्पन्न करनेवाला [परमेश्वर] (वः) तुम्हारी [प्रार्थना] (आ) सब प्रकार (शृणवत्) सुने ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो सेना गण शिल्प विद्या द्वारा आकाश आदि में जाते हैं, और जितेन्द्रिय होकर प्रीति के साथ मिल कर, रहते हैं, वे परमेश्वर से बल पाकर शूर सेनापति की सहायता से शत्रुओं को मारते हैं ॥३॥इस मन्त्र का पहिला भाग आ चुका है-अ० ५।२१।११ ॥