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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [शूर पुरुष] (एनान्=एनम्) उसको (हन्तु) मारे, (प्र दहतु) जला देवे, (यः अरिः) जो वैरी (नः) हम पर (पृतन्यति) सेना चढ़ाता है। (क्रव्यादा) मांसभक्षक [मृतकदाहक] (अग्निना) अग्नि से [जैसे, वैसे] (वयम्) हम (सपत्नान्) वैरियों को (प्र दहामसि) जलाये देते हैं ॥२९॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानवान् शूर पुरुष अपने शत्रु दोषों को इस प्रकार भस्म कर दे, जैसे अग्नि से मृतक शरीर भस्म किया जाता है। यह ईश्वरनियम सब मनुष्यों को मानना चाहिये ॥२९॥
टिप्पणी: २९−(हन्तु) (एनान्) एकवचनस्य बहुवचनम्। एनम्। अरिम् (प्र) प्रकर्षेण (दहतु) भस्मीकरोतु (अरिः) शत्रुः (यः) (नः) अस्मान् (पृतन्यति) पृतनया सेनया युध्यते (क्रव्यादा) मांसभक्षकेन। शवदाहकेन (अग्निना) भौतिकेन (वयम्) धार्मिकाः (सपत्नान्) अरीन् (प्र) (दहामसि) दहामः ॥
