वांछित मन्त्र चुनें

समि॑द्धो अ॒ग्निः स॑मिधा॒नो घृ॒तवृ॑द्धो घृ॒ताहु॑तः। अ॑भी॒षाड् वि॑श्वा॒षाड॒ग्निः स॒पत्ना॑न्हन्तु॒ ये मम॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्ऽइध्द: । अग्नि: । सम्ऽइधान: । घृतऽवृध्द: । घृतऽआहुत: । अभीषाट् । विश्वाषाट् । अग्नि: । सऽपत्नान् । हन्तु । ये । मम ॥१.२८॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:28


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [जैसे] (समिद्धः) प्रकाशमान किया गया और (समिधानः) प्रकाशमान होता हुआ (घृताहुतः) घी चढ़ाया गया और (घृतवृद्धः) घी से बढ़ा हुआ (अग्निः) अग्नि हो। [वैसे ही] (अभीषाट्) सब ओर से जीतनेवाला, (विश्वाषाट्) सबको हरानेवाला (अग्निः) तेजस्वी [शूर पुरुष] (सपत्नान्) वैरियों को (हन्तु) मारे, (ये) जो (मम) मेरे हैं ॥२८॥
भावार्थभाषाः - जैसे अग्नि घृत आदि हव्य पदार्थ से प्रज्वलित होकर रोगकारक दोष को नाश करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या और वीरता से प्रतापी होकर शत्रुओं को नाश करे, यह ईश्वर का नियम है ॥२८॥
टिप्पणी: २८−(समिद्धः) प्रदीप्तः (अग्निः) होमाग्निः (समिधानः) प्रदीप्यमानः (घृतवृद्धः) घृतादिहव्येन प्रवृद्धः (घृताहुतः) घृतं हव्यद्रव्यमाहुतं दत्तं यस्मै सः (अभीषाट्) अ० १२।१।५४। सर्वतोजेता (विश्वाषाट्) अ० १२।१।५४। सर्वजेता (अग्निः) तेजस्वी शूरः (सपत्नान्) शत्रून् (हन्तु) मारयतु (ये) (मम) ॥