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रोहि॑तो॒ दिव॒मारु॑हन्मह॒तः पर्य॑र्ण॒वात्। सर्वो॑ रुरोह॒ रोहि॑तो॒ रुहः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रोहित: । दिवम् । आ । अरुहत् । महत: । परि । अर्णवात् । सर्वा: । रुरोह । रोह‍ित: । रुह: ॥१.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (रोहितः) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] ने (महतः) विशाल (अर्णवात्) समुद्र [अगम्य सामर्थ्य] में से (दिवम्) व्यवहार को (परि) सब ओर से (आ अरुहत्) प्रकट किया है। (रोहितः) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] ने (सर्वाः) सब (रुहः) उत्पन्न करने की सामग्रियों को (रुरोह) उत्पन्न किया है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्रत्येक कार्य का आदि कारण होकर सबको उत्पन्न किया है ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(रोहितः) सर्वोत्पादकः (दिवम्) प्रत्येकव्यवहारम् (आ अरुहत्) प्रादुष्कृतवान् (महतः) विशालात् (परि) सर्वतः (अर्णवात्) समुद्रात्। अगम्यसामर्थ्यात् (सर्वाः) (रुरोह) जनयामास (रोहितः) (रुहः) सृष्टिसामग्रीः ॥