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अनु॑व्रता॒ रोहि॑णी॒ रोहि॑तस्य सू॒रिः सु॒वर्णा॑ बृह॒ती सु॒वर्चाः॑। तया॒ वाजा॑न्वि॒श्वरू॑पां जयेम॒ तया॒ विश्वाः॒ पृत॑ना अ॒भि ष्या॑म ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनुऽव्रता । रोहिणी । रोहितस्य । सूरि: । सुऽवर्णा । बृहती । सुऽवर्चा: । तया । वाजान् । विश्वऽरूपान् । जयेम । तया । विश्वा: । पृतना: । अभि । स्याम ॥१.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (रोहितस्य) सब के उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] की (अनुव्रता) आज्ञा में चलनेवाली (रोहिणी) उत्पत्तिशक्ति [प्रकृति] (सूरिः) प्रेरणा करनेवाली, (सुवर्णा) अच्छे प्रकार स्वीकारयोग्य, (बृहती) विशाल और (सुवर्चाः) बहुत अन्नवाली [वा बहुत चमकीली] है। (तया) उस [प्रकृति] के द्वारा (विश्वरूपान्) सब प्रकार के (वाजान्) बलों को (जयेम) हम जीतें, (तया) उस [प्रकृति] के द्वारा (विश्वाः) सब (पृतनाः) संग्रामों को (अभि ष्याम) हम परास्त करें ॥२२॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्रकृति में अनेक श्रेष्ठ रत्न पदार्थों के उत्पन्न करने की शक्ति दी है। जो मनुष्य पुरुषार्थ करके उससे ज्ञानपूर्वक उपयोग लेते हैं, वे विघ्नों को हटाकर सब कार्य सिद्ध करते हैं ॥२२॥