देवता: अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः
ऋषि: ब्रह्मा
छन्द: आर्षी निचृद्गायत्री
स्वर: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रोहित) हे सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर !] (यम् त्वा) जिस तुझको (प्रष्टिः) प्रश्नयोग्य (पृषती) सींचनेवाली [प्रकृति] (रथे) रमणयोग्य [संसार] में (वहति) प्राप्त होती है। वह तू (अपः) प्रजाओं को (शुभा) शोभा के साथ (रिणन्) चलता हुआ (यासि) चलता है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - खोजने से विवेकी लोग निश्चय करते हैं कि सर्वव्यापक, सर्वनियन्ता परमेश्वर के सामर्थ्य से असीम प्रकृति में संयोग-वियोग होने से संसार का प्रादुर्भाव होता है ॥२१॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० ८।७।२८ ॥
टिप्पणी: २१−(यम्) (त्वा) परमेश्वरम् (पृषती) वर्त्तमाने पृषद्बृहन्मह०। उ० २।८४। पृषु सेचने-अति, ङीप्। सेचनशीला प्रकृतिः (रथे) अ० ४।१२।६। रमणीये संसारे (प्रष्टिः) वसेस्तिः। उ० ४।१८०। प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्-ति प्रष्टव्या (वहति) प्राप्नोति (रोहित) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर (शुभा) शोभया (यासि) गच्छसि। प्राप्नोषि (रिणन्) रि हिंसायां गतौ च-शतृ। गमयन् (अपः) प्रजाः ॥
