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परि॑ त्वा धात्सवि॒ता दे॒वो अ॒ग्निर्वर्च॑सा मि॒त्रावरु॑णाव॒भि त्वा॑। सर्वा॒ अरा॑तीरव॒क्राम॒न्नेही॒दं रा॒ष्ट्रम॑करः सु॒नृता॑वत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि । त्वा । धात् । सविता । देव: । अग्नि: । वर्चसा । मित्रावरुणौ । अभि । त्वा । सर्वा: । अराती: । अवऽक्रामन् । आ । इहि। इदम् । राष्ट्रम् । अकर: । सूनृताऽवत् ॥१.२०॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:20


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (सविता) प्रेरक, (देवः) प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि [सूर्य्य आदि] ने (वर्चसा) तेज के साथ [वर्त्तमान] (त्वा) तुझको (परि) सब ओर से (धात्) धारण किया है और (मित्रावरुणौ) प्राण और अपान वायु ने (त्वा) तुझको (अभि) सब ओर से [धारण किया है]। [हे सेनापते राजन् !] (सर्वाः) सब (अरातीः) वैरी दलों को (अवक्रामन्) लतियाता हुआ तू (आ इहि) आ (इदम् राष्ट्रम्) इस राज्य को तूने (सूनृतावत्) सुन्दर नीतियुक्त (अकरः) बनाया है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार परमेश्वर सब अग्नि, सूर्य्य, वायु आदि पदार्थों को वश में करके सृष्टि का राज्य करता है, इसी प्रकार मनुष्य जितेन्द्रिय होकर विघ्नों को हटा कर आनन्द करे ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(परि) (त्वा) परमेश्वरम् (धात्) अदधात्। धारितवान् (सविता) प्रेरकः (देवः) प्रकाशमानः (अग्निः) सूर्य्यादिः (वर्चसा) तेजसा (मित्रावरुणौ) प्राणापानौ (अभि) प्रति (त्वा) (सर्वाः) (अरातीः) अदानशीलाः शत्रवः (अवक्रामन्) पादेन अधोगमयन् (इह) (इदम्) (राष्ट्रम्) राज्यम् (अकरः) कृतवानसि (सूनृतावत्) सुनीतियुक्तम् ॥