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वाच॑स्पते पृथि॒वी नः॑ स्यो॒ना स्यो॒ना योनि॒स्तल्पा॑ नः सु॒शेवा॑। इ॒हैव प्रा॒णः स॒ख्ये नो॑ अस्तु॒ तं त्वा॑ परमेष्ठि॒न्पर्य॒ग्निरायु॑षा॒ वर्च॑सा दधातु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वाच: । पते । पृथिवी । न: । स्योना । स्योना: । योनि: । तल्पा । न: । सुऽशेवा । इह । एव । प्राण: । सख्ये । न: । अस्तु । तम् । त्वा । परमेऽस्थिन्। परि । अग्नि: ।आयुषा । वर्चसा । दधातु ॥१.१७॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:17


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाचः पते) हे वेदवाणी के स्वामी [परमेश्वर !] (नः) हमारे लिये (पृथिवी) पृथिवी (स्योना) सुखदायक, (योनिः) घर (स्योना) सुखदायक और (तल्पाः) खाट (नः) हमारे लिये (सुशेवा) बड़ी सुखदायक [होवे]। (इह एव) यहाँ ही [इसी मनुष्यजन्म में] (प्राणः) प्राण [जीवनवायु] (नः) हमारी (सख्ये) मित्रता में (अस्तु) होवे, (परमेष्ठिन्) हे बड़े ऊँचे पदवाले [परमेश्वर !] (तम् त्वा) उस तुझको (अग्निः) ज्ञानवान् [यह पुरुष] (आयुषा) आयु के साथ और (वर्चसा) प्रताप के साथ (परि) सब ओर से (दधातु) धारण करे ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का ध्यान करते हुए हम लोग विद्या और पुरुषार्थ के द्वारा संसार के पदार्थों को उपयोगी बनावें ॥१७॥