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ऊ॒र्ध्वो रोहि॑तो॒ अधि॒ नाके॑ अस्था॒द्विश्वा॑ रू॒पाणि॑ ज॒नय॒न्युवा॑ क॒विः। ति॒ग्मेना॒ग्निर्ज्योति॑षा॒ वि भा॑ति तृ॒तीये॑ चक्रे॒ रज॑सि प्रि॒याणि॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऊर्ध्व: । रोहित: । अधि । नाके । अस्थात् । विश्वा । रूपाणि । जनयन् । युवा । कवि: । तिग्मेन ।‍ अग्नि: । ज्योतिषा । वि । भाति । तृतीये । चक्रे । रजसि । प्रियाणि ॥१.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:13» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (युवा) बली, (कविः) ज्ञानी (रोहितः) सबका उत्पन्न करनेवाला [परमेश्वर] (विश्वा) सब (रूपाणि) रूपों [सृष्टि के पदार्थों] को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (नाके) मोक्षसुख में (अधि) अधिकारपूर्वक (ऊर्ध्वः) ऊँचा होकर (अस्थात्) ठहरा है। (अग्निः) प्रकाशस्वरूप [परमेश्वर] (तिग्मेन) तीक्ष्ण (ज्योतिषा) ज्योति के साथ (वि) विविध प्रकार (भाति) चमकता है, उसने (तृतीये) तीसरे [रजोगुण और तमोगुण से भिन्न, सत्त्व] (रजसि) लोक में [वर्त्तमान होकर] (प्रियाणि) प्रिय वस्तुओं को (चक्रे) बनाया है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जिस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वर ने सब संसार को रचा है, विद्वान् लोग उसकी महिमा को प्रत्येक पदार्थ में देखकर अपनी उन्नति करते हैं ॥११॥
टिप्पणी: ११−(ऊर्ध्वः) उन्नतः (रोहितः) सर्वोत्पादकः (अधि) अधिकृत्य (नाके) मोक्षानन्दे (अस्थात्) स्थितवान् (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) सृष्टिवस्तूनि (जनयन्) उत्पादयन् (युवा) बली (कविः) मेधावी (तिग्मेन) तीव्रेण (अग्निः) ज्योतिःस्वरूपः परमेश्वरः (ज्योतिषा) तेजसा (वि) विविधम् (भाति) दीप्यते (तृतीये) रजस्तमोभ्यां भिन्ने सत्त्वगुणे (चक्रे) रचयामास (रजसि) लोके (प्रियाणि) हितकराणि वस्तूनि ॥