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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (च) और (आयुः) जीवन [ब्रह्मचर्यसेवन और वीर्यरक्षण से जीवन का बढ़ाना], (च) और (रूपम्) रूप [शरीरपुष्टि से सुन्दरता], (च) और (नाम) नाम [सत्कर्मों से प्रसिद्धि], (च) और (कीर्तिः) कीर्ति [श्रेष्ठ गुणों के ग्रहण के लिये ईश्वर के गुणों का कीर्तन और विद्यादान आदि सत्य आचरणों से प्रशंसा को स्थिर रखना], (च) और (प्राणः) प्राण वायु (च) और (अपानः) अपान वायु (च) और (चक्षुः) दृष्टि [प्रत्यक्ष, अनुमान और उपमान प्रमाण], (च) और (श्रोत्रम्) श्रवण [शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, संभव और अभाव प्रमाण] ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो राजा के कुप्रबन्ध से वेदविद्या प्रचार से रुक जाती है, अविद्या के फैलने से वह राजा और उसका राज्य सब नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ॥७-१०॥
टिप्पणी: ९−(आयुः) ब्रह्मचर्यसेवनेन वीर्यरक्षणेन च जीवनवर्धनम् (च) (रूपम्) शरीरपुष्ट्या सौन्दर्यम् (च) (नाम) सत्कर्मानुष्ठानेन प्रसिद्धिः (च) (कीर्तिः) सद्गुणग्रहणार्थमीश्वरगुणानां कीर्तनं विद्यादानादिसत्याचरणेन स्वप्रशंसा स्थिरीकरणं च (च) (प्राणः) (च) (अपानः) (च) (चक्षुः) दर्शनम्। प्रत्यक्षानुमानोपमानप्रमाणजातम् (च) (श्रोत्रम्) श्रवणम्। शब्दैतिह्यार्थापत्तिसंभवाभावप्रमाणजातम् (च) ॥
