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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [वेदवाणी !] तू [वेदनिन्दक को] (वृश्च) काट डाल, (प्र वृश्च) चोर डाल, (सं वृश्च) फाड़ डाल, (दह) जला दे, (प्र दह) फूँक दे, (सं दह) भस्म कर दे ॥६२॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश करने में सदा उद्यत रहें ॥६२॥
टिप्पणी: ६२−(वृश्च) छिन्धि (प्र) प्रकर्षेण (वृश्च) (सम्) सम्यक् (वृश्च) (दह) भस्मीकुरु (प्र) (दह) (सम्) (दह) ॥
