0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अघ्न्ये) हे अवध्य ! [न मारने योग्य, प्रबल वेदवाणी] (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारियों के हानिकारक, (कृतागसः) अपराध करनेवाले, (देवपीयोः) विद्वानों के सतानेवाले, (अराधसः) अदानशील पुरुष के (शिरः) शिर को (प्र जहि) तोड़ डाल ॥६०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य बलवती वेदवाणी के विरुद्ध आचरण करे, उसको यथावत् दण्ड मिले ॥६०॥
टिप्पणी: ६०−(अघ्न्ये) म० ५८। (प्र जहि) विनाशय (शिरः) मस्तकम् (ब्रह्मज्यस्य) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकरस्य (कृतागसः) कृतापराधस्य (देवपीयोः) म० १५। विदुषां हिंसकस्य (अराधसः) अ० ५।११।७। नास्ति राधो धनं यस्मात् तस्य। अदानशीलस्य ॥
