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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वेदवाणी !] तू [वेदनिन्दक के लिये] (मेनिः) वज्र, (शरव्या) वाणविद्या में चतुर सेना (भव) हो और (अघात्) [उसके] पाप के कारण से (अघविषा) महाघोर विषैली (भव) हो ॥५९॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अज्ञानी होकर वेदविरुद्ध कुकर्म करे, उसको विद्वान् लोग पूरा दण्ड देवें ॥५९॥
टिप्पणी: ५९−(मेनिः) म० १६। वज्रः (शरव्या) म० २५। शरौ वाणविद्यायां कुशला सेना (भव) (अघविषा) म० १२। अतिशयेन विषमयी (भव) ॥
