0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वेदवाणी !] (जीतम्) हानिकारक पुरुष को (आदाय) लेकर (जीताय) हान किये गये पुरुष के वश में (अमुष्मिन् लोके) उस लोक में [आगामी समय वा जन्म में] (प्र यच्छसि) तू देती है ॥५७॥
भावार्थभाषाः - जो कोई वेदविरोधी वेदानुयायी को क्लेश देता है, वह परमेश्वरनियम से इस जन्म वा पर जन्म में उस सत्पुरुष के अधीन होता है, अर्थात् सत्य धर्म का सदा विजय होता है ॥५७॥
टिप्पणी: ५७−(आदाय) गृहीत्वा (जीतम्) ज्या वयोहानौ कर्तरि−क्त, तकारस्य नत्वाभावः। हानिकर्तारम् (जीताय) कर्मणि−क्त। हानिं गताय पुरुषाय (लोके) संसारे जन्मनि वा (अमुष्मिन्) परस्मिन् (प्र यच्छसि) ददासि ॥
