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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वेदवाणी !] (जिनताम्) हानिकारकों का (वर्चः) तेज, (इष्टम्) यज्ञ [अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, अतिथिसत्कार आदि] (पूर्तम्) पूर्णता [सर्वोपकारी कर्म कूप, तड़ाग, आराम, वाटिका आदि] (च) और (आशिषः) इच्छाओं को (आ दत्से) तू हर लेती है ॥५६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वैदिक रीति से विरुद्ध चलकर अग्निहोत्र, वेदध्ययन आदि छल से करना चाहता है, उससे उसकी इष्टसिद्धि नहीं होती ॥५६॥
टिप्पणी: ५६−(आ दत्से) हरसि (जिनताम्) ज्या वयोहानौ−शतृ। हानिकारकाणाम् (वर्चः) तेजः (इष्टम्) म० १०। अग्निहोत्रवेदाध्ययनातिथ्यादिकर्म (पूर्तम्) म० १०। पूर्णताम्। सर्वोपकारिकूपतडागारामवाटिकादिकर्म (च) (आशिषः) आङः शासु इच्छायाम्−क्विप्। क्विप्प्रत्यये तस्यापि भवतीति वक्तव्यम्। वा० पा० ६।४।३४। इति इत्वम्। हितप्रार्थनाः ॥
