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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षिप्रम्) शीघ्र (वै) निश्चय करके (तस्य) उस [वेदनिन्दक] के विषय में (पृच्छन्ति) लोग पूँछते हैं−“(नु) क्या (इदम्) यह [स्थान] (ता३त् इति) वही है, (यत्) जो (तत्) वह (आसी३त्) [पहिले] था ॥५०॥
भावार्थभाषाः - जब वेदनिन्दक क्षणिक वृद्धि पाकर खोटे कर्मों से नष्ट हो जाता है, जिज्ञासु लोग उसका कारण खोजकर सत्य धर्म में दृढ़ होते हैं ॥५०॥
टिप्पणी: ५०−(क्षिप्रम्) (वै) (तस्य) (पृच्छन्ति) जिज्ञासन्ते (यत्) स्थानम् (तत्) (आसी३त्) प्लुतरूपम्। भूतकाले वर्तमानमभवत् (इदम्) प्रत्यक्षम् (नु) प्रश्ने (ता३त्) प्लुतरूपम्। तदेव (इति) वाक्यसमाप्तौ ॥
