पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताम्) उस (ब्रह्मगवीम्) वेदवाणी को (आददानस्य) छीननेवाले, (ब्राह्मणम्) ब्राह्मण [ब्रह्मचारी] को (जिनतः) सतानेवाले (क्षत्रियस्य) क्षत्रिय की ॥५॥
भावार्थभाषाः - जिस वेदवाणी की प्रवृत्ति से संसार में सब प्राणी आनन्द पाते हैं, उस वेदवाणी को जो कोई अन्यायी राजा प्रचार से रोकता है, उसके राज्य में मूर्खता फैलती है और वह धर्महीन राजा संसार में निर्बल और निर्धन हो जाता है ॥१-६॥
टिप्पणी: ५−(ताम्) तथाभूताम् (आददानस्य) अपहारकस्य (ब्रह्मगवीम्) गोरतद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। ब्रह्म+गो−टच्, टित्त्वाद् ङीप्। ब्रह्मणः परमेश्वरस्य गां वाचम्। वेदवाणीम् (जिनतः) ज्या वयोहानौ−शतृ, अन्तर्गतणिजर्थः। अभिभवतः (ब्राह्मणम्) ब्रह्मचारिणम् (क्षत्रियस्य) राजन्यस्य ॥
