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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षिप्रम्) शीघ्र (वै) निश्चय करके (तस्य) उस [वेदनिन्दक] के (वास्तुषु) घरों में (वृकाः) भेड़िये आदि (ऐलबम्) कलकल शब्द (कुर्वते) करते हैं ॥४९॥
भावार्थभाषाः - कुकर्म के कारण वेदविरोधियों की बस्तियाँ ऊजड़ हो जाती हैं और वहाँ जंगली जन्तु बसने लगते हैं ॥४९॥
टिप्पणी: ४९−(वास्तुषु) निवासेषु (वृकाः) हिंस्राः पशवः (ऐलबम्) म० ४७। आक्रोशम्। अन्यत् पूर्ववत्−म० ४७ ॥
