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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षिप्रम्) शीघ्र (वै) निश्चय करके (तस्य) उस [वेदनिन्दक] के (आदहनं परि) दाह स्थान के आस-पास (केशिनीः) लम्बे केशोंवाली स्त्रियाँ (पाणिना) हाथ से (उरसि) छाती (आघ्नानाः) पीटती हुईं और (पापम्) अशुभ (ऐलबम्) विलाप ध्वनि (कुर्वाणाः) करती हुईं (नृत्यन्ति) डोलती हैं ॥४८॥
भावार्थभाषाः - जब वेदनिन्दक पुरुष खोटे कर्मों के कारण क्लेश के साथ मृत्यु पाता है, तब स्त्री आदि उसके सब कुटुम्बी क्लेश में पड़ते हैं ॥४८॥
टिप्पणी: ४८−(क्षिप्रम्) (वै) एव (तस्य) वेदनिन्दकस्य (आदहनम्) भस्मीकरणस्थानम् (परि) प्रति (नृत्यन्ति) इतस्ततो विचरन्ति (केशिनीः) दीर्घकेशवत्यः (आघ्नानाः) हन हिंसागत्योः−चानश्। ताडयन्त्यः (पाणिना) हस्तेन (उरसि) वक्षसि (कुर्वाणाः) कुर्वत्यः (पापम्) अशुभम् (ऐलबम्) म० ४७। विलापध्वनिम् ॥
