0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षत्रियेण) क्षत्रिय करके (अपुनर्दीयमाना) फिर नहीं दी गयी (ब्रह्मगवी) वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारियों के हानिकारक के (सर्वान्) सब (विवाहान्) विवाहों और (ज्ञातीन्) भाई-बन्धुओं को (अपि) भी (क्षापयति) नाश करती है ॥४४॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष वेदविद्या को रोककर विद्वानों की हानि करता है, वह गृहाश्रम से गिरकर अपने भाई-बन्धुओं को भी नष्ट कर देता है ॥४४॥
टिप्पणी: ४४−(विवाहान्) विवाहसंस्कारान् (ज्ञातीन्) बान्धवान् (सर्वान्) (अपि) एव (क्षापयति) क्षै क्षये−णिच्। नाशयति (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकरस्य (क्षत्रियेण) राजन्येन (अपुनर्दीयमाना) न पुनर्दीयमाना ॥
