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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्याः) उस [वेदवाणी] का (आहननम्) ताड़ना [वेदनिन्दक के लिये] (कृत्या) हिंसा क्रिया, (आशसनम्) [उसको] पीड़ा देना (मेनिः) [उसके लिये] वज्र, और [ऊबध्यम्] [उसका] दुष्ट बन्धक (वलगः) [उसके लिये] दुःख है ॥३९॥
भावार्थभाषाः - वेदनिन्दक लोग अपने कुस्वभाव और कुव्यवहार के कारण दुःख भोगते हैं ॥३९॥
टिप्पणी: ३९−(तस्याः) ब्रह्मगव्याः (आहननम्) समन्तात्ताडनम् (कृत्या) म० १२। हिंसाक्रिया (मेनिः) वज्रः (आशसनम्) शसु हिंसायाम्−ल्युट्। सर्वथा हिंसनम् (वलगः) अ० ५।३१।४। मुदिग्रोर्गग्गौ। उ० १।१२८। बल वधे−ग प्रत्ययः, अकारागमः। वधः (ऊबध्यम्) अ० ९।४।१६। दुर्+बध संयमने=बन्धने−यत्, दुर् इत्यस्य स्थाने ऊत्त्वम्। दुर्बन्धनम् ॥
