0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अशिता) खायी गयी (ब्रह्मगवी) वेदवाणी (ब्रह्मज्यम्) ब्रह्मचारियों के हानिकारक को (अस्मात् लोकात्) इस लोक से (च) और (अमुष्मात्) उस [लोक] से (च) भी (छिनत्ति) काट डालती है ॥३८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य ब्रह्मचारियों पर अत्याचार करके वेदविरुद्ध चलता है, उसके यह लोक और परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं ॥३८॥
टिप्पणी: ३८−(अशिता) भक्षिता। नाशिता (लोकात्) जन्मनः (छिनत्ति) भिनत्ति। नाशयति (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (ब्रह्मज्यम्) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकरम् (अस्मात्) प्रत्यक्षात् (च) (अमुष्मात्) परस्मात् (च) ॥
