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वि॒षं प्र॒यस्य॑न्ती त॒क्मा प्रय॑स्ता ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विषम् । प्रऽयस्यन्ती । तक्मा । प्रऽयस्ता ॥८.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:31


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वह [वेदवाणी] (प्रयस्यन्ती) क्लेश में पड़ती हुई [वेदविरोधी को] (विषम्) विष, और (प्रयस्ता) क्लेश में डाली गयी (तक्मा) जीवन के कष्टदायक [ज्वररूप] होती है ॥३१॥
भावार्थभाषाः - तपस्वी वेदानुगामियों का दुःखदायी पुरुष अज्ञान बढ़ाकर घोर नरक में पड़ता है ॥३१॥
टिप्पणी: ३१−(विषम्) (प्रयस्यन्ती) प्रयासं क्लेशं सहमाना (तक्मा) अ० १।२५।१। कृच्छ्रजीवनकारी ज्वरो यथा (प्रयस्ता) आयासं क्लेशं प्राप्ता ॥