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श॑र॒व्या॒ मुखे॑ऽपिन॒ह्यमा॑न॒ ऋति॑र्ह॒न्यमा॑ना ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शरव्या । मुखे । अपिऽनह्यमाने । ऋति: । हन्यमाना: ॥७.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:25


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मुखे अपिनह्यमाने) मुख बाँधे जाने पर वह [वेदवाणी] [वेदनिरोधक के लिये] (शरव्या) बाणविद्या में चतुर सेना [के समान] और (हन्यमाना) ताड़ी जाती हुई वह (ऋतिः) आपत्तिरूप होती है ॥२५॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों को वेदवाणी के प्रचार से रोकनेवाले पुरुष अज्ञान के कारण विपत्तियाँ झेलते हैं ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(शरव्या) अ० ३।१९।८। शरु−यत्। शरौ वाणविद्यायां कुशला सेना (मुखे) (अपिनह्यमाने) अपवध्यमाने (ऋतिः) ऋ हिंसायाम्−क्तिन्। निर्ऋतिः। आपत्तिः (हन्यमाना) ताड्यमाना ॥