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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [वेदवाणी] (दुह्यमाना) [विद्वानों कर के] दुही जाती हुई [वेदनिरोधक को] (मेनिः) वज्ररूप और (दुग्धा) दुही गयी वह (शीर्षक्तिः) [उसको] मस्तक पीड़ा होती है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जैसे-जैसे लोग अभ्यास करके वेदविद्या का प्रचार करते हैं, वैसे-वैसे ही वेदनिरोधक लोग संकट में पड़ते हैं ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(मेनिः) म० १६। वज्रः (दुह्यमाना) दोहेन गृह्यमाणा (शीर्षक्तिः) अ० १।१२।३। शीर्ष+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्तिन्। मस्तकपीडा (दुग्धा) दोहेन प्राप्ता ॥
