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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मेहन्ती) [विद्वानों को] सींचती हुई और [वेदविरोधक के] (कर्णौ) दो विज्ञानों [अभ्युदय और निःश्रेयस अर्थात् तत्त्वज्ञान और मोक्षज्ञान] को (वरीवर्जयन्ती) सर्वथा रोकती हुई [वेदवाणी] [उसके लिये] (सर्वज्यानिः) सब हानि करनेवाले (राजयक्ष्मः) राजरोग [के समान] होती है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जब संसार में वेदों का विज्ञान बढ़ता है, तब पाखण्ड मत नष्ट हो जाता है, जैसे उपाय न करने पर राजरोग से रोगी का नाश हो जाता है ॥२२॥ इस मन्त्र का मिलान−अथर्व० १२।४।६। से करो ॥
टिप्पणी: २२−(सर्वज्यानिः) अ० ११।३।५५। वीज्याज्वरिभ्यो निः। उ० ४।४८। ज्या वयोहानौ−नि। सर्वहानिकरः (कर्णौ) अ० १२।४।६। कॄ विज्ञाने−न प्रत्ययो नित्। अभ्युदयनिःश्रेयसबोधौ (वरीवर्जयन्ती) वृजी वर्जने यङ्लुकि शतृ। भृशं वर्जयन्ती (राजयक्ष्मः) राजरोगः (मेहन्ती) सिञ्चती धार्मिकान् ॥
