वांछित मन्त्र चुनें

क्षु॒रप॑वि॒रीक्ष॑माणा॒ वाश्य॑माना॒भि स्फू॒र्जति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क्षुरऽपवि: । ईक्षमाणा । वाश्यमाना। अभि। स्फूर्जति ॥७.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:20


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ईक्षमाणा) देखती हुई वह [वेदवाणी] [रोकनेवाले को] (क्षुरपविः) छुरा [कटार आदि] की धार [समान] होती है, (वाश्यमाना) शब्द करती हुई वह (अभि) सब ओर (स्फूर्जति) गरजती है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी के शुभ गुण प्रकट होने पर दुष्टों की दुष्टता सर्वथा नष्ट हो जाती है ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(क्षुरपविः) शस्त्रधारा यथा (ईक्षमाणा) पश्यन्ती (वाश्यमाना) वाशृ शब्दे−शानच्। शब्दायमाना (अभि) सर्वतः (स्फूर्जति) टुओस्फूर्जा वज्रघोषे। गर्जति ॥