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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [वेदवाणी] [पापी के] (शफान्) शान्तिव्यवहारों को (उत्खिदन्ती) नाश करती हुई (हेतिः) वज्ररूप है, और (अपेक्षमाणा) सब ओर दृष्टि फैलाती हुई वह (महादेवः) बड़े विजय चाहनेवाले [शूर पुरुष के समान] है ॥१९॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी की प्रवृत्ति में विघ्नकारी पुरुष मूर्खता के कारण सर्वथा नष्ट हो जाता है ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(हेतिः) हन हिंसागत्योः−क्तिन्। वज्रः−निघ० २।२०। (शफान्) शम शान्तौ आलोचने च−अच्, भस्य फः। शान्तिव्यवहारान् (उत्खिदन्ती) खिद परिघाते दैन्ये च−शतृ। सर्वतो नाशयन्ती (महादेवः) दिवु विजिगीषायाम्−अच्। महाविजिगीषुः शूरपुरुषो यथा (अपेक्षमाणा) सर्वतो दृष्टिं कुर्वाणा ॥
