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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (धावन्ती) दौड़ती हुई वह [वेदवाणी] [दुष्ट के लिये] (वज्रः) वज्ररूप, और (उद्वीता) ऊँची हुई वह [सज्जन के लिये] (वैश्वानरः) सर्वनायक पुरुष [के समान हितकारी] है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी की प्रवृत्ति से संसार में पापियों का नाश और धर्मात्माओं को आनन्द का प्रकाश होता है ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(वज्रः) (धावन्ती) शीघ्रं गच्छन्ती (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। विश्व+नॄ प्रापणे−अच्, स्वार्थे−अण्। वैश्वानरः कस्माद् विश्वान् नरान् नयतीति−निरु० ७।२१। सर्वनायकः पुरुषो यथा (उद्वीता) वी गतौ−क्त। उदयं गता ॥
