वांछित मन्त्र चुनें

तस्मा॒द्वै ब्रा॑ह्म॒णानां॒ गौर्दु॑रा॒धर्षा॑ विजान॒ता ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तस्मात् । वै । ब्राह्मणानाम् । गौ: । दु:ऽआधर्षा । विऽजानता ॥७.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:17


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मात्) इस लिये (वै) ही (ब्राह्मणानाम्) ब्रह्मचारियों की [हितकारिणी] (गौः) वेदवाणी (विजानता) विरुद्ध जाननेवाले करके (दुराधर्षा) कभी न जीतने योग्य है ॥१७॥
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय पुरुष ही वेदवाणी से आनन्द पाते हैं और दुरात्मा अत्याचारी उसे कभी नहीं प्राप्त कर सकते ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(तस्मात्) कारणात् (वै) निश्चयेन (ब्राह्मणानाम्) ब्रह्मचारिणां हितकरी (गौः) वेदवाणी (दुराधर्षा) सर्वथा दुर्जेया (विजानता) विरुद्धं विदुषा पुरुषेण ॥