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मे॒निः श॒तव॑धा॒ हि सा ब्र॑ह्म॒ज्यस्य॒ क्षिति॒र्हि सा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मेनि: । शतऽवधा । हि । सा । ब्रह्मऽज्यस्य । क्षिति: । हि । सा ॥७.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [वेदवाणी] (हि) निश्चय करके (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारियों के हानिकारक की (शतवधा) शतघ्नी [सैकड़ों को मारनेवाली] (मेनिः) वज्र, (सा हि) वह ही [उसकी] (क्षितिः) नाश शक्ति है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वेदप्रचारकों को हानि पहुँचाता है, वह संसार की हानि कर के आप भी अनेक विपत्तियों में पड़ता है ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(मेनिः) अ० २।११।१। डुमिञ् प्रक्षेपणे−नि। वज्रः−निघ० २।२०। (शतवधा) शतघ्नी। बहुहन्त्री (हि) निश्चयेन (सा) वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकारकस्य (क्षितिः) नाशशक्तिः ॥