पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा एषा) वह यही (ब्रह्मगवी) वेदवाणी [वेदनिन्दक को] (भीमा) डरावनी (अघविषा) महाघोर विषैली, (साक्षात्) साक्षात् [प्रत्यक्ष] (कृत्या) हिंसारूप और (कूल्बजम्) भूमि पर दाह उपजानेवाली वस्तुरूप [हो जाती है, जब वह] (आवृता) रोक दी गयी हो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - शान्तिकारक वेदविद्या के रोक देने से अधर्म बढ़ने पर संसार में बड़े-बड़े उपद्रव फैलते हैं ॥१२॥ इस मन्त्र का मिलान मन्त्र ५३ से करो ॥
टिप्पणी: १२−(सा−एषा) पूर्वोक्तैव (भीमा) भयंकरा (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (अघविषा) अघ पापकरणे−अच्+विष विप्रयोगे−क, टाप्। अतिशयेन विषमयी यथा (साक्षात्) प्रत्यक्षम् (कृत्या) अ० ४।९।५। कृञ् हिंसायाम्−क्यप्+तुक्, टाप्। हिंसाक्रिया (कूल्बजम्) कु+उल्व+जम्। उल्वादयश्च। उ० ४।९५। कु+उल दाहे−वन्+अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। जन जनने−ड। कौ भूमौ दाहजनकं वस्तु तथा (आवृता) आच्छादिता। निरुद्धा ॥
