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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तानि सर्वाणि) ये सब (ब्रह्मगवीम्) वेदवाणी को (आददानस्य) छीननेवाले, (ब्राह्मणम्) ब्राह्मण [ब्रह्मचारी] को (जिनतः) सतानेवाले (क्षत्रियस्य) क्षत्रिय के (अप क्रामन्ति) चले जाते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो राजा के कुप्रबन्ध से वेदविद्या प्रचार से रुक जाती है, अविद्या के फैलने से वह राजा और उसका राज्य सब नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ॥७-१०॥ १−मन्त्र ११ का मिलान ऊपर मन्त्र ५, ६ से करो ॥११॥ २−मन्त्र ७-११ महर्षि दयानन्दकृत, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोक्तधर्मविषय पृष्ठ १०२-३ में तथा संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्यख्यात हैं ॥
टिप्पणी: ११−(तानि) पूर्वोक्तानि (सर्वाणि) समस्तानि (अप क्रामन्ति) अपगच्छन्ति। विनश्यन्ति। अन्यत् पूर्ववत्−म० ५ ॥
