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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अथ) और (ये) जो (गोपतिम्) भूपति [राजा] को (पराणीय) बहका कर (आहुः) कहते हैं−“(मा ददाः इति) मत दे। (ते) वे लोग (अचित्त्या) अज्ञान से (रुद्रस्य) दुःखनाशक शूर पुरुष के (अस्ताम्) चलाये हुए (हेतिम्) वज्र को (परि) सब ओर से (यन्ति) पाते हैं ॥५२॥
भावार्थभाषाः - जो दुष्ट दुर्बलेन्द्रिय राजा को कुमार्ग में डाल कर वेदवाणी के प्रचार में रुकावट डाले, उसको शूरवीर पुरुष यथावत् दण्ड देवे ॥५२॥
टिप्पणी: ५२−(ये) दुष्टाः (गोपतिम्) भूपालम्। राजानम् (पराणीय) कुमार्गे नीत्वा (अथ) पुनः (आहुः) कथयन्ति (मा ददाः) मा देहि (इति) (रुद्रस्य) दुःखनाशकस्य (अस्ताम्) क्षिप्ताम् (ते) दुष्टाः (हेतिम्) वज्रम् (परि) सर्वतः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (अचित्त्या) अज्ञानेन ॥
