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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (परिरापिणः) बतबने लोग (वशायाः) कामनायोग्य [वेदवाणी] के (अदानाय) न दान करने के लिये (वदन्ति) कहते हैं। (जाल्माः) वे क्रूर (अचित्या) अज्ञान से (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् पुरुष के (मन्यवे) क्रोध के कारण (आ) सब ओर से (वृश्चन्ते) छिन्न-भिन्न होते हैं ॥५१॥
भावार्थभाषाः - जो लोग वेदवाणी के प्रकाश रोकने के लिये दूसरों को बहकाते हैं, उन दुष्टों को प्रतापी मनुष्य नष्ट कर देवे ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(ये) (वशायाः) कमनीयाया वेदवाण्याः (वदन्ति) (परिरापिणः) रप व्यक्तायां वाचि−णिनि। परिलपनशीलाः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतः पुरुषस्य (मन्यवे) क्रोधाय (जाल्माः) जल अपवारणे−णिच्−म प्रत्ययः। पामराः। क्रूराः (आ) समन्तात् (वृश्चन्ते) छिद्यन्ते (अचित्या) अज्ञानेन ॥
