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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्याः) इस [वेदवाणी] के (पदोः) स्थिर वा पाने योग्य (अधिष्ठानात्) प्रभाव से (विक्लिन्दुः) विगतशोक मनुष्य (नाम) नाम [बड़ाई] (विन्दति) पाता है। [वेदवाणी के] (अनामनात्) यथावत् न विचारने से वे [प्रजाएँ, मनुष्य] (सं शीर्यन्ते) सर्वथा नष्ट किये जाते हैं, (याः) जो [प्रजाजन] (मुखेन) मुख से [उस को] (उपजिघ्रति) तुच्छपन के साथ ग्रहण करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि वेदवाणी के विचार से प्रधानता पाकर क्लेशों से छूटकर सुख भोगें। जो वेदवाणी के बिना विचारे दिखावे के लिये रटते हैं, वे कष्ट पाते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(पदोः) भृमृशीङ्०। उ० १।७। पद स्थैर्ये गतौ च−उ। स्थिरात् प्रापणीयात् (अस्याः) वेदवाण्याः (अधिष्ठानात्) प्रभावात् (विक्लिन्दुः) भृमृशीङ्०। उ० १।७। वि+क्लिदि रोदने शोके च−उ। विगतशोकः (नाम) वशः (विन्दति) प्राप्नोति (अनामनात्) नञ्+आङ्+मन बोधे−अच्। सर्वथा मननराहित्यात् (संशीर्यन्ते) सम्यग् नाश्यन्ते (मुखेन) (उपजिघ्रति) घ्रा ग्रहणे भ्वादिः, जुहोत्यादित्वं छान्दसम्। बहुलं छन्दसि। पा० ७।४।७८। अभ्यासस्य इत्वम्। उप हीनतया जिघ्रति गृह्णन्ति ॥
