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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हीडिताः) क्रोधित (देवाः) विद्वान् लोग (एताभिः) इन (ऋग्भिः) स्तुतियोग्य वेदवाणियों द्वारा (भेदम्) फूट डालनेवाले से (परि) घिर कर (अवदन्) बोले−“(वशाम्) कामनायोग्य [वेदवाणी] (नः) हमको (न अदात्) उसने नहीं दी है, (इति) सो (तस्मात् वै) इससे ही (सः) वह (परा अभवत्) हारा है ॥४९॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग निश्चय कर देते हैं कि वेदवाणी का रोकनेवाला पुरुष अज्ञान बढ़ने से क्लेश में पड़ता है ॥४९॥
टिप्पणी: ४९−(देवाः) विद्वांसः (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (परि) परीत्य (अवदन्) अब्रुवन् (न) निषेधे (नः) अस्मभ्यम् (अदात्) दत्तवान् (इति) एवम् (हीडिताः) म० २८। क्रुद्धाः (एताभिः) (ऋग्भिः) स्तुत्याभिर्वेदवाणीभिः (भेदम्) भिदिर् विदारणे−अच्। भेदकम्। कुटिलम् (तस्मात्) कारणात् (वै) (एव) (सः) भेदकः (पराभवत्) पराजितोऽभवत् ॥
