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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - “(ब्राह्मणाः) हे ब्रह्मचारियो ! (एतत्) यह (वः) तुम्हारा (हविः) ग्राह्य द्रव्य है−(इति) ऐसा (याचितः) जिससे [वेदवाणी] माँगी जावे वह [विद्वान्] (मन्वीत) माने। (वशाम्) कामनायोग्य [वेदवाणी] को (च इत्) ही (एनाम्) इस [विद्वान्] से (याचेयुः) वे [ब्रह्मचारी] माँगे, (या) जो [वेदवाणी] (अददुषः) दान न करनेवाले के (गृहे) घर में (भीमा) डरावनी है ॥४८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् को चाहिये के ब्रह्मचारियों को वेदवाणी का दान करके संसार का उपकार करे। विद्या की रोक से अविद्या के कारण विपत्तियाँ फैलती हैं ॥४८॥
टिप्पणी: ४८−(एतत्) (वः) युष्माकम् (ब्राह्मणाः) हे ब्रह्मचारिणः (हविः) ग्राह्यं वस्तु (इति) एवम् (मन्वीत) जानीयात् (याचितः) प्रार्थितः पुरुषः (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (च इत्) एव (एनम्) पुरुषम् (याचेयुः) भिक्षेरन् (या) वेदवाणी (भीमा) भयङ्करा (अददुषः) अदत्तवतः पुरुषस्य (गृहे) गेहे ॥
