0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - “(बृहस्पते) हे बड़ी वेदवाणियों के रक्षक ! (या) जो (विलिप्ती) विशेष वृद्धिवाली (अथो) और भी (सूतवशा) उत्पन्न जगत् को वश में करनेवाली (वशा) कामनायोग्य [वेदवाणी] है। (तस्याः) उस [वेदवाणी] का (न अश्नीयात्) वह भोग [अनुभव] नहीं कर सकता, (यः) जो (अब्राह्मणः) अब्रह्मचारी [ब्रह्मचर्य न रखनेवाला पुरुष] (भूत्याम्) ऐश्वर्य में (आशंसेत) इच्छा करे ॥४६॥
भावार्थभाषाः - संसार का हित करनेवाली वेदवाणी को मनुष्य विना ब्रह्मचर्य कभी नहीं पा सकता और न ऐश्वर्यवान् हो सकता है। यह गत मन्त्र का उत्तर है ॥४६॥ इस मन्त्र का मिलान ऊपर मन्त्र ४४ से करो ॥
टिप्पणी: ४६−(विलिप्ती) म० ४१। विशेषवृद्धियुक्ता (अथो) अपि च। अन्यत् पूर्ववत्−म० ४४ ॥
