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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - “(नारद) हे नीति बतानेवाले [ऋषि] ! (अनुष्ठु) अनुष्ठान [कर्मारम्भ] (विदुषे) जानते हुए (ते) तुझ को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे। (आसाम्) इन [संसार की शक्तियों] में से (कतमा) कौनसी (वशा) कामनायोग्य शक्ति (भीमतमा) अत्यन्त भयानक है, (याम्) जिस को (अदत्त्वा) न देकर (पराभवेत्) [मनुष्य] हार पावे ॥४५॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासु विद्वान् से प्रश्न करे कि संसार के बीच शक्तियों में से वह कौन सी शक्ति है, जिसकी प्रवृत्ति रोकने से मनुष्य गिरकर कष्ट पाता है ॥४५॥
टिप्पणी: ४५−(नमः) सत्कारः (ते) तुभ्यम् (अस्तु) (नारद) म० १६। हे नीतिप्रद (अनुष्ठु) अपदुःसुषु स्थः। उ० १।२५। अनु+ष्ठा गतिनिवृत्तौ−कु। अनुष्ठानम्। कर्मारम्भम् (विदुषे) जानते (वशा) कमनीया शक्तिः (कतमा) बह्वीषु का (आसाम्) वशानाम् (भीमतमा) अतिशयेन भयङ्करा (याम्) (अदत्त्वा) (पराभवेत्) पराजयं प्राप्नुयात् पुरुषः ॥
