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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशा गौ सूक्त

कति॒ नु व॒शा ना॑रद॒ यास्त्वं वे॑त्थ मनुष्य॒जाः। तास्त्वा॑ पृच्छामि वि॒द्वांसं॒ कस्या॒ नाश्नी॑या॒दब्रा॑ह्मणः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कति । नु । वशा: । नारद । या: । त्वम् । वेत्थ । मनुष्यऽजा: । ता: । त्वा । पृच्छामि । विद्वांसम् । कस्या: । न । अश्नीयात् । अब्राह्मण: ॥४.४३॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:43


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - “(नारद) हे नीति बतानेवाले [आचार्य] ! (कति नु) कितनी ही (वशाः) कामनायोग्य [शक्तियाँ] हैं, (याः) जिनको (मनुष्यजाः) मननशीलों में उत्पन्न हुआ (त्वम्) तू (वेत्थ) जानता है, (ताः) उन को (विद्वांसम्) जाननेवाले (त्वा) तुझसे (पृच्छामि) मैं पूछता हूँ, (अब्राह्मणः) अब्रह्मचारी [ब्रह्मचर्य न रखता हुआ पुरुष] (कस्याः) कौनसी [शक्ति] का (न) नहीं (अश्नीयात्) भोग [अनुभव] कर सकता ॥४३॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासु बहुश्रुत विद्वान् से निश्चय करे कि जितनी शक्तियाँ आप जानते हैं, उनमें वह कौनसी है, जिससे मनुष्य विना ब्रह्मचर्य धारण किये सुख पा लेवे। इस प्रश्न का उत्तर आगे है ॥४३॥
टिप्पणी: ४३−(कति) किंपरिमाणाः (नु) प्रश्ने (वशाः) कमनीयाः शक्तयः (नारद) म० १६। हे नीतिप्रद (याः) (त्वम्) (वेत्थ) जानासि (मनुष्यजाः) मनुष्य+जनी प्रादुर्भावे−विट्। मनुष्येषु मननशीलेषूत्पन्नः (ताः) (त्वा) (पृच्छामि) अहं जिज्ञासे (विद्वांसम्) जानन्तम् (कस्याः) (न) निषेधे (अश्नीयात्) भुञ्जीत। अनुभवेत् (अब्राह्मणः) अब्रह्मचारी ॥