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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विजय चाहनेवाले [जिज्ञासुओं] ने (ताम्) उस [वेदवाणी] को (अमीमांसन्त) विचारा−“(इयम्) यह [वेदवाणी] (वशा) कामनायोग्य है, [अथवा] (अवशा इति) कामनायोग्य नहीं है। (ताम्) उसके विषय में (नारदः) नीति बतानेवाले [आचार्य] ने (अब्रवीत्) कहा−“(एषा) यह [वेदवाणी] (वशानाम्) सब कामनायोग्य [शक्तियों] में (वशतमा इति) अत्यन्त कामनायोग्य है ॥४२॥
भावार्थभाषाः - प्रथम से जिज्ञासु ब्रह्मचारियों ने परस्पर प्रश्नोत्तर और परीक्षा करके निश्चय किया है कि यह वेदवाणी ही संसार भर में ऐसी है कि जिसके अभ्यास से मनुष्य सब इष्ट पदार्थ पा लेता है ॥४२॥
टिप्पणी: ४२−(ताम्) वेदवाणीम् (देवाः) विजिगीषवः (अमीमांसन्त) मान जिज्ञासायाम्−स्वार्थे सन्−लङ्। विचारितवन्तः (वशा) कमनीया (इयम्) वेदवाणी (अवशा) अकमनीया (इति) (ताम्) वेदवाणीम् (अब्रवीत्) कथितवान् (नारदः) म० १६। नीतिप्रदः (एषा) वेदवाणी (वशानाम्) कमनीयानां शक्तीनां मध्ये (वशतमा) अतिशयेन कमनीया (इति) ॥
