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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जिन (वशाः) कामनायोग्य [शक्तियों] को (देवाः) विजय चाहनेवाले [जिज्ञासुओं] ने (यज्ञात्) यज्ञ [परमेश्वर की पूजा, संगतिकरण और दानव्यवहार] से (उदेत्य) ऊँचे होकर (उदकल्पयन्) उत्तम माना है। (तासाम्) उन [शक्तियों] के बीच (विलिप्त्यम्) विशेष वृद्धिवाली और (भीमाम्) भयानक [वेदवाणी] को (नारदः) नीति देनेवाले [आचार्य] ने (उदाकुरुत) स्वीकार किया है ॥४१॥
भावार्थभाषाः - सदा से विद्वानों ने अनेक शक्तियों की कल्पना करके यही निश्चय किया है कि संसार में शिष्टों की वृद्धि करनेवाली और दुष्टों की ताड़नेवाली इस वेदवाणी के तुल्य अन्य कोई शक्ति नहीं है ॥४१॥
टिप्पणी: ४१−(याः) (वशाः) कमनीयाः शक्तयः (उदकल्पयन्) उत्तमाः कल्पितवन्तः (देवाः) विजिगीषवः। जिज्ञासवः (यज्ञात्) ईश्वरपूजासंगतिकरणदानव्यवहारात् (उदेत्य) उदयं प्राप्य (तासाम्) वशानां मध्ये (विलिप्त्यम्) वि+लिप उपदेहे−क्तिन्, उपदेहो वृद्धिः। नित्यं छन्दसि। पा० ४।१।४६। इति ङीप्। अमि यणादेशश्छान्दसः। विशेषा वृद्धिर्यस्यास्ताम् (भीमाम्) भयङ्ककराम् (उदाकुरुत) स्वीकृतवान् (नारदः) म० १६। नीतिप्रदो विद्वान् ॥
