0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रवीयमाना) फेंकी जाती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (गोपतये) पृथिवीपालक [राजा] के लिये (क्रुद्धा) क्रुद्ध होकर (चरति) विचरती है।(मा) मुझ को (वेहतम्) गर्भघातिनी स्त्री [के समान रोगिणी] (मन्यमानः) मानता हुआ [वह राजा] (मृत्योः) मृत्यु के (पाशेषु) फन्दों में (बध्यताम्) बाँधा जावे ॥३७॥
भावार्थभाषाः - जिस राजा के राज्य में वेदवाणी प्रचार से रोकी जाती है, वह राजा अपने राज्यसहित अधर्म बढ़ने से नष्ट हो जाता है ॥३७॥
टिप्पणी: ३७−(प्रवीयमाना) वी गत्यसनादिषु−कर्मणि शानच्, असनं क्षेपणम्, प्रक्षिप्यमाणा (चरति) विचरति (क्रुद्धा) कुपिता (गोपतये) भूपालाय। राज्ञे (वशा) कमनीया वेदवाणी (वेहतम्) अ० ३।२३।१। संश्चत्तृपद्वेहत्। उ० २।८५। वि+हन हिंसागत्योः−अति। पृषोदरादिरूपम्। गर्भघातिनीस्त्रीतुल्यरोगिणीम् (मा) माम् (मन्यमानः) जानन् (मृत्योः) मरणस्य (पाशेषु) बन्धेषु (बध्यताम्) गृह्यताम् ॥
