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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (यमराज्ये) न्यायकारी [परमेश्वर] के राज्य में (प्रददुषे) अपने बड़े दानी के लिये (सर्वान्) सब (कामान्) श्रेष्ठ कामनाएँ (दुहे) पूरी करती है। (अथ) और (याचिताम्) उस माँगी हुई को (निरुन्धानस्य) रोकनेवाले का (लोकम्) लोक [घर] (नरकम्) नरक [महाकष्टस्थान] (आहुः) वे [विद्वान्] बताते हैं ॥३६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा की व्यवस्था समझ कर वेदवाणी का प्रकाश करते हैं, वे अपने सब अभीष्ट सुख पाते हैं, और उसके रोकनेवाले मूर्ख अज्ञान बढ़ने से क्लेश में पड़ते हैं ॥३६॥
टिप्पणी: ३६−(यमराज्ये) न्यायकारिणः परमेश्वरस्य राज्यनियमे (अथ) पुनः (आहुः) कथयन्ति विद्वांसः (नरकम्) नृणाति क्लेशं प्रापयतीति नरकः। कृञादिभ्यः संज्ञायां वुन्। उ० ५।३५। नॄ नये−वुन्। सांहितिको दीर्घः। महाक्लेशस्थानम् (लोकम्) गृहम् (निरुन्धानस्य) प्रतिरोधकस्य (याचिताम्) प्रार्थितां ताम्। अन्यत् पूर्ववत्−अ० ३५ ॥
