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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशा गौ सूक्त

पु॑रो॒डाश॑वत्सा सु॒दुघा॑ लो॒केऽस्मा॒ उप॑ तिष्ठति। सास्मै॒ सर्वा॒न्कामा॑न्व॒शा प्र॑द॒दुषे॑ दुहे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पुरोडाशऽवत्सा। सुऽदुघा । लोके । अस्मै । उप । तिष्ठति । सा । अस्मै । सर्वान् । कामान् । वशा । प्रऽददुषे । दुहे ॥४.३५॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:35


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरोडाशवत्सा) बढ़कर दान करने [वा उत्तम अन्न पाने] के लिये उपदेश करनेवाली, (सुदुघा) सुन्दर रीति से पूर्ण करनेवाली (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (लोके) संसार में (अस्मै) उस पुरुष के लिये (उप तिष्ठति) उपस्थित होती है। (सा) वह (अस्मै) इस (प्रददुषे) बड़े दानी के लिये (सर्वान्) सब (कामान्) श्रेष्ठ कामनाएँ (दुहे) पूरी करती है ॥३५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सब गुणों की खान वेदविद्या के अभ्यास और प्रकाश से धार्मिक होकर अपनी सब कामनाएँ पूरी करता है ॥३५॥
टिप्पणी: ३५−(पुरोडाशवत्सा) पुरो अप्रे दाश्यते दीयते, दाशृ दाने−घञ्+वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। वद व्यक्तायां वाचि−स, टाप्। पुरोडाशाय उत्तमदानाय परिपक्वान्नाय वा वदत्युपदिशति या सा (सुदुघा) अ० ७।७३।७। यथाविधि पूरयित्री। कामदा (लोके) संसारे (अस्मै) पुरुषाय (उपतिष्ठति) उपस्थिता भवति (सा) (अस्मै) (सर्वान्) (कामान्) श्रेष्ठाभिलाषान् (वशा) (प्रददुषे) प्रकर्षेण दत्तवते (दुहे) दुग्धे। प्रपूरयति ॥