0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (प्रगृहीतम्) फैला कर लिया गया (आज्यम्) घी (स्रुचः) स्रुचा [चमचा] से (अग्नये) अग्नि को (आलुम्पेत्) छोड़ दिया जावे। (एव ह) वैसे ही (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारियों को (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (अददत्) न देता हुआ पुरुष (अग्नये) अग्नि [सन्ताप] पाने के लिये (आ वृश्चते) छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥३४॥
भावार्थभाषाः - जैसे प्रज्वलित हवन अग्नि में छोड़ा हुआ घी शीघ्र भस्म हो जाता है, वैसे ही वेदविद्या के रोकने से संसार की हानि करके मनुष्य क्लेश में पड़कर नष्ट हो जाता है ॥३४॥
टिप्पणी: ३४−(यथा) येन प्रकारेण (आज्यम्) घृतम् (प्रगृहीतम्) प्रकर्षेण धृतम् (आलुम्पेत्) लुप्लृ छेदने विनाशने च। समन्ताद् नश्येत् (स्रुचः) चिक् च। उ० २।६२। स्रु गतौ−चिक्। यज्ञपात्रविशेषात्। चमसात् (अग्नये) पावकाय (एव) तथा (ह) हि (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारिभ्यः (वशाम्) वेदवाणीम् (अग्नये) सन्तापाय। क्लेशाय (आ) समन्तात् (वृश्चते) वृश्च्यते। छिद्यते (अददत्) अप्रयच्छन् पुरुषः ॥
