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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (राजन्यस्य) ऐश्वर्यवान् [राजा] की (माता) माता [मान करनेवाली] है, (तथा) वैसा ही (अग्रशः) पहिले से (संभूतम्) ठहरा हुआ [कर्म] है। (तस्याः) उस [वेदवाणी] का (अनर्पणम्) अत्याग (आहुः) वे [विद्वान्] कहते हैं, (यत्) जब कि (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारियों को (प्रदीयते) वह दे दी जाती है ॥३३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का नियम है कि विद्या के दान से राजा का मान बढ़ता है और विद्या भी अधिक-अधिक प्रचार से अधिक-अधिक बढ़ती है ॥३३॥
टिप्पणी: ३३−(वशा) कमनीया वेदवाणी (माता) मानकर्त्री (राजन्यस्य) म० ३२। ऐश्वर्यवतः क्षत्रियस्य (तथा) तेन प्रकारेण (सम्भूतम्) समर्थितं परमेश्वरेण (अग्रशः) आदौ (तस्याः) वेदवाण्याः (आहुः) कथयन्ति विद्वांसः (अनर्पणम्) (अत्यागम्) सदावर्धनम् (यत्) यदा (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारिभ्यः (प्रदीयते) प्रकर्षेण दीयते सा ॥
