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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (राजन्यः) ऐश्वर्यवान् [राजा] (पितृभ्यः) पालन करनेवाले [विज्ञानियों] और (देवताभ्यः) विजय चाहनेवाले [शूरवीरों] को (स्वधाकारेण) स्वधारण सामर्थ्य देने से (यज्ञेन) सत्कार से और (दानेन) दान से (वशायाः) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (मातुः) माता के (हेडम्) क्रोध को (न) नहीं (गच्छति) पाता है ॥३२॥
भावार्थभाषाः - जहाँ राजा विद्वानों के दान-मान से वेदविद्या का प्रकाश करता है, वह राज्य चिरस्थायी होता है ॥३२॥
टिप्पणी: ३२−(स्वधाकारेण) स्वधारणसामर्थ्यदानेन (पितृभ्यः) पालकेभ्यो विद्वद्भ्यः (यज्ञेन) सत्कारेण (देवताभ्यः) विजिगीषुभ्यः शूरेभ्यः (दानेन) पालनेन (राजन्यः) राजेरन्यः। उ० ३।१००। राजृ दीप्तौ ऐश्वर्ये च−अन्य। ऐश्वर्यवान्। राजा (वशायाः) कमनीयाया वेदवाण्याः (मातुः) मानकर्त्र्याः (हेडम्) कोपम् (न) निषेधे (गच्छति) प्राप्नोति ॥
